( Tribute to my father on his death anniversary )
गोरखपुर के रूस्तमपुर, चौरहिया गोला, दीवान बाज़ार का बाशिंदा हूं
मैं मरा नहीं , मैं ज़िंदा हूं
मैं आज में हूं , मैं कल में हूं
मैं संध्या के हर पल में हूं
अपने बेटे बहुओं का हिस्सा हूं
जो कभी छुपा नहीं वो किस्सा हूं
अपने भाईयों बहनों के लाड में हूं
उनकी मुराद में हूं, उनकी याद में हूं
मैं अपने हर एक शिष्य में हूं
उनके उज्जवल भविष्य में हूं
अपने दोस्तों की खुशहाली में हूं
उनकी ईद में हूं , उनकी दिवाली में हूं
मैं अपने हर एक विद्यार्थी के अभिमान में हूं
मैं विधि के हर ज्ञान में हूं
मैं एक मिसाल बनने में हूं
अपनी लिखी किताब के हर एक पन्ने में हूं
खुले आसमान में उड़ता हुआ मस्त परिंदा हूं
मैं मरा नहीं , मैं ज़िंदा हूं
मैं मरा नहीं , मैं ज़िंदा हूं

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