बेचारा सा एक कलम पड़ा था मेज के कोने में
मैने तरस खाके उसकी ओर देखा
कलम मुस्कुराके बोला
साला मैं बेचारा नहीं तुम बेचारे हो
लिखने का मन है तो भाव कांहे खा रहे हो
अहम के चपेट में थोड़ा अकडू दिखना शुरू करो
गर्दन झुकाओ और लिखना शुरू करो
मुझे गुस्सा आया
साले कलम की गर्दन कसके दबाई
उसकी सिसकी बाहर आई
वो लाचार सा दिखने लगा और मैं लिखने लगा
कलम अभी भी मुस्कुरा रहा था
बोला साले मेरी गर्दन जितनी भी कस लो
मुझे तो ये हमेशा खुशी रहेगी
लिखते वकत तुम्हारी गर्दन हमेशा झुकी रहेगी
मैने गुस्से में गर्दन को ऊपर किया
अपनी अकड़ को एक नया अंजाम दिया
पर कलम दिशाहीन हो गई
अब कैसे लिखूं कुछ समझ नहीं आया
पंक्ति क्या, एक शब्द भी नहीं लिख पाया
ख़ैर दोनों का सफर एक
मंज़िल भी शायद एक
कलम को था ये एहसास
दोनों की जुगलबंदी का भलीभाती था आभास
कलम अपनी हंसी रोक के बोला
लिखाई के बिना दोनों हैं व्यर्थ
अपनी अहम को आकार दो
लिखो ऐसा की साकार हो
जिसका हो अर्थ
अपनी अहम को छोड़ मैं बेचारा सा दिखने लगा
गर्दन को झुकाया और लिखने लगा

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