छवि अपनी तू धूल कर
दुनियादारी को भूल कर
थोड़ा सा विचलित कर अपना ये मन
हर पल में है कुछ अपनापन
भंवरा बन बगिया में घूम
नेकी कर मस्ती में झूम
आज ना आयेगा कल
तू ठाठ से चल, आंखें मत मल
लोगों का तू डर मत रख
बकने वाले तो बकेंगे सब
अपनी ही तू लय में बढ़
मनमौजी से तू सपने गढ़
एक ही तो है ये छोटी सी
काट नहीं, तू ज़िन्दगी जी
सब समझ रहा तू, फर्जी का है ये भोलापन
थोड़ा सा तू दीवाना बन, थोड़ा सा तू आवारा बन
थोड़ा सा तू दीवाना बन, थोड़ा सा तू आवारा बन

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