June 16, 2026
Chicago 12, Melborne City, USA
कविताएँ

kalam ki jeet

बेचारा सा एक कलम पड़ा था मेज के कोने में
मैने तरस खाके उसकी ओर देखा

कलम मुस्कुराके बोला
साला मैं बेचारा नहीं तुम बेचारे हो
लिखने का मन है तो भाव कांहे खा रहे हो
अहम के चपेट में थोड़ा अकडू दिखना शुरू करो
गर्दन झुकाओ और लिखना शुरू करो

मुझे गुस्सा आया
साले कलम की गर्दन कसके दबाई
उसकी सिसकी बाहर आई
वो लाचार सा दिखने लगा और मैं लिखने लगा

कलम अभी भी मुस्कुरा रहा था
बोला साले मेरी गर्दन जितनी भी कस लो
मुझे तो ये हमेशा खुशी रहेगी
लिखते वकत तुम्हारी गर्दन हमेशा झुकी रहेगी

मैने गुस्से में गर्दन को ऊपर किया
अपनी अकड़ को एक नया अंजाम दिया
पर कलम दिशाहीन हो गई
अब कैसे लिखूं कुछ समझ नहीं आया
पंक्ति क्या, एक शब्द भी नहीं लिख पाया

ख़ैर दोनों का सफर एक
मंज़िल भी शायद एक
कलम को था ये एहसास
दोनों की जुगलबंदी का भलीभाती था आभास
कलम अपनी हंसी रोक के बोला
लिखाई के बिना दोनों हैं व्यर्थ
अपनी अहम को आकार दो
लिखो ऐसा की साकार हो
जिसका हो अर्थ

अपनी अहम को छोड़ मैं बेचारा सा दिखने लगा
गर्दन को झुकाया और लिखने लगा

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