हौसला बुलंद था
आशिकी पे अपने घमंड था
लब पे उसका ही नाम था
घर पे बोल दिया कुछ ज़रूरी काम था
रस्ते पे थोड़ा जाम था
शहर जो आम था
मिलना था कमसिन कली से
निकल लिया पतली गली से
बाइक को भगाके
साइड मिरर में अपने को सजाके
मैं मंज़िल की ओर बढ़ रहा था
मन ही मन कहानियां गढ़ रहा था
चौराहे का रेड लाइट तोड़कर
ट्रैफिक पुलिस को राम राम बोलकर
स्टाइल से मैं ब्रेक मारा था
गिरते गिरते बचा पर अंदाज़ बड़ा करारा था
रुकने का कोई सवाल ना था
आशिकी में झुकना तब बवाल ना था
आखिर में मंजर सामने आया
उसने जब अपना लाल दुपट्टा लहराया
खोया मेरा होश था
पर मिलने का जोश था
गजब सी महक थी उसके सैंट में
मिलकर चल दिए हम रेस्टोरेंट में
