कविताएँ

chhote shahar ka pyaar

हौसला बुलंद था
आशिकी पे अपने घमंड था
लब पे उसका ही नाम था
घर पे बोल दिया कुछ ज़रूरी काम था
रस्ते पे थोड़ा जाम था
शहर जो आम था
मिलना था कमसिन कली से
निकल लिया पतली गली से
बाइक को भगाके
साइड मिरर में अपने को सजाके
मैं मंज़िल की ओर बढ़ रहा था
मन ही मन कहानियां गढ़ रहा था
चौराहे का रेड लाइट तोड़कर
ट्रैफिक पुलिस को राम राम बोलकर
स्टाइल से मैं ब्रेक मारा था
गिरते गिरते बचा पर अंदाज़ बड़ा करारा था
रुकने का कोई सवाल ना था
आशिकी में झुकना तब बवाल ना था
आखिर में मंजर सामने आया
उसने जब अपना लाल दुपट्टा लहराया
खोया मेरा होश था
पर मिलने का जोश था
गजब सी महक थी उसके सैंट में
मिलकर चल दिए हम रेस्टोरेंट में

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