कुछ मुहल्ले के दोस्त थे
तबियत से खुशमिजाज
जशन में मगन
और अपनी ही धुन में सारे वो मदहोश थे
ऐसे ही मेरे कुछ मुहल्ले के दोस्त थे
दाना पानी भी था साथ
उठना बैठना भी था साथ
सुनहरे बचपन में उनका भी था हाथ
सीटियाबाजी में माहिर और सैर सपाटे के वो स्नोत थे
वही कुछ मुहल्ले के दोस्त थे
वो चौक के समोसे, कुल्हड़ की चाय और मीठी लस्सी
बांध रखी थी इक ऐसी हमें रस्सी
साथ ये छूटेना, ऐसे कुछ हमारे सोच थे
यारों के यार वो मुहल्ले के दोस्त थे
मटरगश्ती बहुत की, हम सयाने थे
पास हमारे हंसी के सौ बहाने थे
किसी ना किसी बहाने मिलते हम रोज़ थे
सोसायटी के नहीं, हम मुहल्ले के दोस्त थे
