वो जो लकड़ी के कुर्सी और मेज पड़े हैं बरांदे में
उनकी अहमियत कबतक टाल पाएंगे
वो जो पेड़ लगाया था छोटे से लॉन में
उनकी छाव से कब तक भाग पाएंगे
लालटेन और मोमबत्ती से रोशनियां जो आती थीं
रात के अंधेरे को चीर कर उजाला सा कर जाती थीं
छोटा सा मंदिर जो बनाया था अपने आशियाने में
मलाल सा रह गया है फिर से उसे पाने में
वो जो मुजैक से फर्श बने थे कमरों में
उसपे कुछ गंदे परत से जम गए हैं
लगता है इधर हम अपने घर बहुत कम गए हैं
सवाल पूछने कुछ मेरे मन के भ्रम गए हैं
जल्द जवाब आ जाएगा उनका
तबतक कुछ और दुनियादारी सा कर ले
कुछ और अपनी ज़िन्दगी से मारा मारी सा करलें
