कविताएँ

khaamkha chhod di


कभी ख़तम ना होंगी शिकायतें अपनी
बेवजह पाल जो रखी हैं चाहतें इतनी

थमने की अब गुंजाईश नहीं
चाहतों में रम जो गई हैं गुज़ारिशें अपनी

इश्क़ के मंसूबे भी अब पाक नहीं
किसी मकसद से हो रही हैं इबादतें अपनी

अनंत हैं, ना कभी पूरी हो सकेंगी ख्वाहिशें अपनी
ख़ामख़ा छोड़ दी जिनके लिए हमने आबाई रिहाईशें अपनी….

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