October 16, 2026
कविताएँ

मौसम का ये मस्ताना रूप

मौसम का ये मस्ताना रूपधूप में हवा , हवा में धूपअजब सा ये कुदरती फंडाठंडे में गरम , गरम में ठंडा बहला रहे बेचैन सी हस्तीमस्ती में मौज, मौज में मस्ती

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कविताएँ

अभी ग़ालिब हूं मैं

कभी फ़िराक कभी मीरकभी बेलगाम कमान से निकली हुई तीरकभी हरिवंश, कभी दिनकरघूमता फिरता बिंदास बनकरकभी फ़ैज़ कभी साहिरमौज़ में अव्वल दर्जे का माहिरदावा करोगे तो ख़ारिज हूं मैंपर अभी छेड़ो ना मुझेअभी ग़ालिब हूं मैं

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कविताएँ

काफ़ी पुराने ज़माने का दिल है मेरा

काफ़ी पुराने ज़माने का दिल है मेरा…. यादों कि क़िताब उठा कर देखा तो तुम मेरी,ख्वाबों कि क़िताब उठा कर देखा तो तुम मेरी, काफ़ी सुहाने ज़माने का दिल है मेरा…. मुरादों कि क़िताब उठा कर देखा तो तुम मेरी,खयालातों कि क़िताब उठा कर देखा तो तुम मेरी, काफ़ी मस्ताने ज़माने का दिल है मेरा….

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कविताएँ

वो जो बेटी है ना

वो एक दिशा है एक उत्साह है, एक पर्व हैसोचो तो प्यार समझो तो गर्व है वो एक दिया है अंधेरों को चीरती हैखुद जलकर रोशनी बिखेरती है वो एक पहेली है एक मिसाल हैपरख के देखलो वो बेमिसाल है वही हमारा कल थी वही हमारा आज हैवो जो बेटी है ना वही दुनिया का

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कविताएँ

chhote shahar ka pyaar

हौसला बुलंद थाआशिकी पे अपने घमंड थालब पे उसका ही नाम थाघर पे बोल दिया कुछ ज़रूरी काम थारस्ते पे थोड़ा जाम थाशहर जो आम थामिलना था कमसिन कली सेनिकल लिया पतली गली सेबाइक को भगाकेसाइड मिरर में अपने को सजाकेमैं मंज़िल की ओर बढ़ रहा थामन ही मन कहानियां गढ़ रहा थाचौराहे का रेड

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कविताएँ

थोड़ा सा तू दीवाना

छवि अपनी तू धूल करदुनियादारी को भूल करथोड़ा सा विचलित कर अपना ये मनहर पल में है कुछ अपनापनभंवरा बन बगिया में घूमनेकी कर मस्ती में झूमआज ना आयेगा कलतू ठाठ से चल, आंखें मत मललोगों का तू डर मत रखबकने वाले तो बकेंगे सबअपनी ही तू लय में बढ़मनमौजी से तू सपने गढ़एक ही

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कविताएँ

वो जो लकड़ी के कुर्सी

वो जो लकड़ी के कुर्सी और मेज पड़े हैं बरांदे मेंउनकी अहमियत कबतक टाल पाएंगे वो जो पेड़ लगाया था छोटे से लॉन मेंउनकी छाव से कब तक भाग पाएंगे लालटेन और मोमबत्ती से रोशनियां जो आती थींरात के अंधेरे को चीर कर उजाला सा कर जाती थीं छोटा सा मंदिर जो बनाया था अपने

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कविताएँ

वो बेटी

ज़िन्दगी भर जो साथ देती, वो बेटीमुस्कुरा कर हर बात जो मान लेती, वो बेटीपापा के पीछे पीछे जो चलती रहती, वो बेटीमां का काम जो हल्का कर देती, वो बेटीभाई का जो बेधड़क साथ देती, वो बेटीघर का माहौल जो मध्धम रखती, वो बेटीसबके बारे में जो मन ही मन सोचती, वो बेटीसूने आंगन

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कविताएँ

मुहल्ले के दोस्त

कुछ मुहल्ले के दोस्त थेतबियत से खुशमिजाजजशन में मगन और अपनी ही धुन में सारे वो मदहोश थेऐसे ही मेरे कुछ मुहल्ले के दोस्त थे दाना पानी भी था साथउठना बैठना भी था साथसुनहरे बचपन में उनका भी था हाथसीटियाबाजी में माहिर और सैर सपाटे के वो स्नोत थेवही कुछ मुहल्ले के दोस्त थे वो

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कविताएँ

मुझे ए आई ( AI Artificial Intelligence ) नहीं, माई ( Mother ) चाहिए

मुझे ए आई ( AI Artificial Intelligence ) नहीं, माई ( Mother ) चाहिए माँ कठिन राह को चुनती थीकपड़े हाथों से बुनती थीवो सुई धागा, वो ऊन के गोलेमाँ की ममता मन से बोलेकि जबसे ऑनलाइन का चलन है आयावास्तव में वास्तविकता में खलन है लायामुझे कपड़े ऑनलाइन नहींमाँ के हाथों वाली बुनाई चाहिएमुझे

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