अभी ग़ालिब हूं मैं
कभी फ़िराक कभी मीरकभी बेलगाम कमान से निकली हुई तीरकभी हरिवंश, कभी दिनकरघूमता फिरता बिंदास बनकरकभी फ़ैज़ कभी साहिरमौज़ में अव्वल दर्जे का
कभी फ़िराक कभी मीरकभी बेलगाम कमान से निकली हुई तीरकभी हरिवंश, कभी दिनकरघूमता फिरता बिंदास बनकरकभी फ़ैज़ कभी साहिरमौज़ में अव्वल दर्जे का
काफ़ी पुराने ज़माने का दिल है मेरा…. यादों कि क़िताब उठा कर देखा तो तुम मेरी,ख्वाबों कि क़िताब उठा कर देखा तो तुम
वो एक दिशा है एक उत्साह है, एक पर्व हैसोचो तो प्यार समझो तो गर्व है वो एक दिया है अंधेरों को चीरती
हौसला बुलंद थाआशिकी पे अपने घमंड थालब पे उसका ही नाम थाघर पे बोल दिया कुछ ज़रूरी काम थारस्ते पे थोड़ा जाम थाशहर
छवि अपनी तू धूल करदुनियादारी को भूल करथोड़ा सा विचलित कर अपना ये मनहर पल में है कुछ अपनापनभंवरा बन बगिया में घूमनेकी
वो जो लकड़ी के कुर्सी और मेज पड़े हैं बरांदे मेंउनकी अहमियत कबतक टाल पाएंगे वो जो पेड़ लगाया था छोटे से लॉन
कुछ मुहल्ले के दोस्त थेतबियत से खुशमिजाजजशन में मगन और अपनी ही धुन में सारे वो मदहोश थेऐसे ही मेरे कुछ मुहल्ले के
मुझे ए आई ( AI Artificial Intelligence ) नहीं, माई ( Mother ) चाहिए माँ कठिन राह को चुनती थीकपड़े हाथों से बुनती
( Tribute to my father on his death anniversary ) गोरखपुर के रूस्तमपुर, चौरहिया गोला, दीवान बाज़ार का बाशिंदा हूं मैं मरा नहीं